| تـعـطي الحـيـاة قيـادها لك كلما |
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صـيـرتـهـا للـمكـرمات ذلولا |
| العـز مـقـيـاس الحياة وضل من |
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قد عد مـقـيـاس الـحـياة الطولا |
| قل كيف عاش ولا تقل كم عاش من |
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جـعـل الـحـياة إلى علاه سبيلا |
| لا غرو ان طوت الـمـنـية ماجدا |
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كـثـرت محـاسنـه وعاش قليلا |
| قتلوك للدنيـا ولـكـن لـم تــدم |
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لبني أمية بعـد قـتـلـك جـيـلا |
| اضميـر غيـب الله كـيف لك الفنـا |
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نفـذت وراء حجـابـه المخــزون |
| وتـصك جبهتـك السيــوف وانهـا |
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لــولا عينيــك لـم تكـن لـيمين |
| ما كنت حين صرعت مضعوف القوى |
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فأقـول لم تـرفـد بنصـر مـعين |
| امــا وشيبتـك الخضيبـة انهــا |
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لا يـركـــل الية ويــــمين |
| لـو كـنت تستـام الحياة لارخصت |
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منهـا لـك الاقـدار كـل ثميــن |
| اوشئت محو عداك حتـى لا يـرى |
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منهـم على الغبراء شـخص قطين |
| لاخــذت افـاق البـلاد عليهــم |
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وشحنـت قطريها بـجيش منـون |
| حتـى إذا لم تبـق نـافخ حـزمـة |
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منهــم بكل مفـاوز وحصــون |
| لكـن دعتك لبـذل نـفسك عـصبة |
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حـان انتشار ضـلالهـا المـدفون |
| فـرأيـت ان لقـاء ربــك بـاذلا |
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للنفس افضـل مـن بقـاء ضنيـن |